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Wednesday, July 24, 2019

लखनऊ : नई शिक्षा नीति में कम हो सरकारी हस्तक्षेप


जय नारायण महाविद्यालय (केकेसी) एवं नेशनल कोएलिशन फॉर एजूकेशन, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में मंगलवार को नई शिक्षा नीति (2019) प्रारूपविषय पर आधारित एक दिवसीय संगोष्ठी आयोजित की गई।
गोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता शामिल हुए नेशनल कोएलिशन फॉर एजूकेशन कन्वीनर रमाकांत राय ने कहा कि शिक्षा केक्षेत्र में किसी भी विसंगति को केवल शिक्षक ही दूर कर सकता है और दूसरा कोई नहीं। उन्होंने कहा कि, वर्तमान में पिछले कई वर्ष से चली आ रही शिक्षा प्रणाली में अब परिवर्तन की बात सामने आ रही है। इसमें शिक्षा और उसके प्रचालन में कई बड़े परिवर्तन किए जाने हैं। उन्होंने नई शिक्षा नीति-2019 के प्रारूप पर शिक्षकों और छात्र-छात्रओं से विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि नई शिक्षा नीति के प्रारूप में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप को कम करने, सब्सिडी और अनुदान को कम करने तथा एफिलिएशन पर नियंत्रण को कम करने पर जोर दिया गया है। शिक्षा पर बजट में कम आवंटन को उन्होंने तर्कसंगत न मानते हुए कहा कि केवल दिल्ली सरकार, बजट का 26 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च कर रही है।
बाकी सभी प्रदेशों में औसतन 10 प्रतिशत खर्च ही इस मद में किया जा रहा है। उन्होंने नई शिक्षा नीति (प्रारूप) की समीक्षा करते हुए उसे शिक्षाविदों, शिक्षकों और परंपरागत प्रणाली के समीप रखे जाने की बात कही। इस अवसर पर प्राचार्य प्रो. एसडी शर्मा, डॉ. अरुण मिश्र, डॉ. एससी हजेला, डॉ. हरेंद्र राय, अध्यक्ष शिक्षक महासंघ, उत्तर प्रदेश, डॉ. एसपी शुक्ल, डॉ. एके अवस्थी समेत बड़ी संख्या में महाविद्यालय के बड़ी संख्या में शिक्षक व छात्र मौजूद रहे।

Tuesday, July 9, 2019

स्कूली शिक्षा के लिए यूजीसी जैसा नियामक बनाने का प्रस्ताव


प्रस्तावित नई शिक्षा नीति को लागू करने की तैयारियों के बीच स्कूली शिक्षा को मजबूती देने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी ) जैसा एक नियामक बनाने की मांग ने तेजी पकड़ी है। खासबात यह है कि यह प्रस्ताव मानव संसाधन विकास मंत्रलय से जुड़ी संस्था राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआइओएस) की ओर से आया है। जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच बंटी स्कूली शिक्षा को उच्च शिक्षा की तरह एक नियामक के दायरे में बनाने की बात कही है। इसके लिए स्कूली शिक्षा आयोग (एसईसी) नाम भी प्रस्तावित किया है। इसमें शिक्षक शिक्षा (टीचर एजुकेशन) को भी शामिल करने का प्रस्ताव है। एनआइओएस ने यह प्रस्ताव मानव संसाधन विकास मंत्रलय के साथ सभी राज्यों को भी भेजा है। साथ ही इसे लेकर समर्थन मांगा है। एनआइओएस के अध्यक्ष प्रोफेसर सीबी शर्मा के मुताबिक नई शिक्षा नीति के जरिए सरकार जब पूरी शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने जा रही है, तब ऐसे में स्कूली शिक्षा के लिए यूजीसी जैसा एक नियामक होना जरूरी है। उन्होंने सरकार को इसके लिए प्रस्ताव दिया है। साथ ही इसे नई शिक्षा नीति में शामिल कर इस पर तुरंत अमल करने को भी कहा है। एनआइओएस के इस प्रस्ताव को शिक्षाविदें ने समर्थन करते हुए सरकार को जल्द आयोग बनाने का सुझाव दिया है। प्रोफेसर शर्मा के मुताबिक उच्च शिक्षा आज जिस ऊंचाई पर है, उसके पीछे यूजीसी जैसे नियामक की बड़ी भूमिका है। वहीं स्कूली शिक्षा के इस हालत में पहुंचने के पीछे जो बड़ी खामी है, वह इसका कोई एक नियामक का न होना है। गौरतलब है कि देश भर में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और उसे मजबूती देने का पूरा जिम्मा मौजूदा समय में यूजीसी के पास है। इनमें केंद्रीय और राज्य के विश्वविद्यालय दोनों ही शामिल हैं।

Sunday, July 7, 2019

स्कूली शिक्षा में होगा बड़ा बदलाव, अब सिर्फ तीन साल की होगी प्राथमिक शिक्षा



प्रस्तावित नई शिक्षा नीति को लागू करने के अपने इरादे में सरकार यदि सफल हुई, तो देश का 50 साल पुराना स्कूली शिक्षा का ढांचा पूरी तरह से बदल जाएगा। हालांकि सरकार ने जिस तरह से बजट में इसे लागू करने का इरादा जताया है, उसके बाद इसे लेकर हलचल बढ़ी हुई है।
इसके चलते जो बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे, उनमें स्कूली शिक्षा में फाउंडेशन स्तर के एक नए शिक्षाक्रम की शुरूआत होगी। जिसमें प्री-प्राइमरी से दूसरी कक्षा तक की पढाई शामिल होगी। जबकि प्राथमिक (प्राइमरी) शिक्षाक्रम सिमट कर तीसरी, चौथी और पांचवी तक रह जाएगा। स्कूली शिक्षा का मौजूदा ढांचा 1968 में तैयार किया गया था।
नई शिक्षा नीति के प्रस्तावित मसौदे में स्कूली शिक्षा के ढांचे में बदलाव के इस लक्ष्य को 2022 तक हासिल करने की सिफारिश की गई है। साथ ही कहा कि इससे स्कूली शिक्षा में रटने-रटाने का चलन खत्म होगा और बच्चों में आवश्यक ज्ञान, मूल्य, रूझान, हुनर और कौशल जैसे तार्किक चिंतन, बहुभाषी क्षमता और डिजिटल साक्षरता जैसे विषयों के विकास में मदद मिलेगी।
नीति में स्कूली शिक्षा के ढांचे में बदलाव की जो और बड़ी सिफारिशें की गई है, उनमें स्कूली शिक्षा का तीसरा क्रम माध्यमिक स्तर का होगा, जो तीन साल का होगा और इनमें कक्षा छह, सात और आठवीं शामिल होगा। वहीं चौथा क्रम उच्च या सेकेंडरी स्तर का होगा। जो चार वर्ष का होगा। जिसमें नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई शामिल होगी।
वहीं स्कूली शिक्षा में प्रस्तावित फाउंडेशन शिक्षा पांच सालों की होगी। जिसमें तीन साल प्री-प्राइमरी और दो साल में पहली और दूसरी की पढ़ाई होगी। नीति के मुताबकि बदलाव की यह सिफारिश मौजूदा दौर में बच्चों की उम्र और उनकी जरूरतों के लिहाज से तय किया गया है। हालांकि नीति में यह साफ किया गया है, कि इस आधार पर भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव करने की कोई जरूरत नहीं है।
स्कूली शिक्षा का कुछ इस तरह का होगा प्रस्तावित ढांचा
- पांच वर्षो की बुनियादी अवस्था( फाउंडेशन स्टेज): इनमें तीन वर्ष प्राइमरी स्कूल के और पहली और दूसरी कक्षा होगी शामिल।
- प्राथमिक(प्राइमरी) शिक्षा तीन वर्ष की होगी: इनमें अब सिर्फ कक्षा तीन, चार और पांच शामिल होगा।
-तीन वर्ष की होगी माध्यमिक अवस्था: इनमें कक्षा छह, सात और आठ होगा शामिल।
- उच्च या सेकेंडरी अवस्था: यह चार वर्षो की होगी। इनमें कक्षा नौ, दस, ग्यारहवीं और बारहवीं होगा शामिल।
मौजूदा समय में कुछ इस तरह का है स्कूली शिक्षा का ढांचा
-प्राथमिक अवस्था: कक्षा एक से पांच तक।
-उच्च प्राथमिक अवस्था: कक्षा छह से आठ तक।
-माध्यमिक अवस्था : कक्षा नौ और दस ।
- उच्च माध्यमिक या इंटरमीडिएट अवस्था: ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा।

Wednesday, June 26, 2019

नई शिक्षा नीति: BEd के बाद नौकरी की गारंटी, अन्य कामों से दूर रहेंगे शिक्षक



नई शिक्षा नीति में शिक्षक पेशे में अच्छी प्रतिभाओं को आकर्षित करने की सिफारिश की गई है। साथ ही शिक्षक तैयार करने वाले संस्थानों के ढांचागत परिवर्तन पर भी जोर दिया गया है।

मौजूदा दौर में जब अच्छी प्रतिभाएं शिक्षक के पेशे में नहीं आ रही है, ऐसे में प्रस्तावित नई शिक्षा नीति में इन्हें आकर्षित करने की बड़ी पहल की गई है। इसके तहत बीएड (शिक्षक बनने वाले कोर्स) में दाखिला लेने वाले छात्रों को आकर्षक छात्रवृति के साथ गारंटीड नौकरी देने की सिफारिश भी की गई है। फिलहाल ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत बताई गई है।
नई शिक्षा नीति के प्रस्तावित मसौदे में साफ माना गया है कि शिक्षकों के पेशे में युवाओं का जो कम रुझान है उसकी बड़ी वजह पैसा, नौकरी की गारंटी और सम्मान का भाव पैदा ना होना है। ऐसे में इन बाधाओं को समाप्त करना जरूरी है। नीति में बीएड के चार वर्षीय कोर्स को तेजी से पढ़ाने का भी प्रस्ताव है। इसके साथ शिक्षक तैयार करने वाले संस्थानों के ढांचे को मजबूत बनाने की भी सिफारिश की गई है। मसौदे में शिक्षक तैयार करने वाले देश के 17 हजार संस्थानों पर भी सवाल खड़े किए गए है। साथ इन संस्थानों में पैसे लेकर डिग्रियां बांटे जाने का भी खुलासा किया है।
पढ़ाई के अलावा सभी कामों से किया जाय अलग
नई शिक्षा नीति के मसौदे में शिक्षकों को अध्यापन के अलावा सभी गैर जरूरी कामों से अलग करने की सिफारिश भी की गई है। इनमें चुनावी ड्यूटी से मुक्त रखने, मिड-डे मील जैसी जिम्मेदारियों से अलग रखने सहित कई सिफारिशें की गई है। नीति में इस बात का भी जोर दिया गया है कि शिक्षकों को समय पर अध्यापन से जुड़ी विशेष ट्रेनिंग भी दी जाए, जिससे वह अपने ज्ञान को और निखार सकें।
शिक्षकों की जरूरत का हो अध्ययन
नई शिक्षा नीति के मसौदे में शिक्षकों की जरूरत का पता लगाने के लिए प्रत्येक पांच साल में एक अध्ययन की भी सिफारिश की गई है। जो प्रत्येक राज्यों को करनी होगी। इस पूरी कवायद के पीछे जो कारण है, वह यह है की शिक्षकों की आने वाली जरूरत को समय से पहले पहचाना जा सके, ताकि समय रहते जरूरी प्रबंध किए जा सकें।
निजी स्कूलों में भी टीईटी पास शिक्षक की हो नियुक्ति
प्रस्तावित मसौदे में टीईटी (टीचर एलिजविलिटी टेस्ट) को निजी स्कूलों में पढाने वाले शिक्षकों के लिए भी अनिवार्य करने की सिफारिश की गई है। मौजूदा समय में यह सिर्फ सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए ही अनिवार्य है।

नई शिक्षा नीति में सुझाए गए बच्चों की तार्किक क्षमता बढ़ाने के उपाय


स्कूलों में बच्चे सीखेंगे शतरंज की चाल
पढ़ाई-लिखाई के साथ स्कूलों में अब बच्चों की तार्किक क्षमता बढ़ाने का भी काम होगा। नई शिक्षा नीति में इसे लेकर जोरदार पहल की गई है। इसके तहत स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अनिवार्य रूप से शतरंज खेलने के लिए प्रेरित किया जाएगा। साथ ही उन्हें शब्द और तर्क पहेलियों जैसी गतिविधियों से भी जोड़ने की सिफारिश की गई है। नीति में बच्चों में घटती तार्किक क्षमता को लेकर चिंता जताई गई है।
नई शिक्षा नीति के प्रस्तावित मसौदे में कहा गया है, जिस तरह बच्चों के स्वस्थ रहने के लिए स्कूलों में खेलकूद और शारीरिक कसरत जरूरी है, उसी तरह दिमाग के विकास के लिए दिमागी कसरत भी जरूरी है जो शतरंज या दूसरी तार्किक गतिविधियों से हो सकती है। इसमें शतरंज को पूरी ताकत के साथ बढ़ावा देने की बात कही गई है। कहा गया है कि इस खेल का उद्भव भारत में ही हुआ है। भारतीय बच्चों को इस खेल से अनिवार्य रूप से जोड़ना चाहिए। मसौदे में कहा गया है कि शब्द, समस्या-समाधान और तर्क पहेलियां बच्चों में तार्किक क्षमता बढ़ाने का एक आनंददायी तरीका है। इसके जरिये बच्चों में तर्क करने की क्षमता विकसित की जा सकती है। यदि स्कूली स्तर पर बच्चों में तर्क करने की यह क्षमता विकसित कर दी जाए तो उसे पूरे जीवन उसका फायदा मिलेगा।
मसौदे से साफ है कि स्कूली शिक्षा को मजबूत बनाने और बच्चों के विकास के लिए कितने निचले स्तर पर चिंतन किया गया है। इसमें बच्चों को गणितीय अंक ज्ञान से जोड़ने की सिफारिश भी की गई है। जिसमें कहा गया है कि मौजूदा समय में बच्चे केवल एक करोड़ तक गिनना सीखते है जो आज की दुनिया में अपर्याप्त है। मालूम हो कि नई शिक्षा नीति के मसौदे पर सरकार फिलहाल अभी राय ले रही है। जिसकी अंतिम तिथि 30 जून है। इसके बाद अमल की प्रक्रिया शुरू होगी।

Sunday, June 9, 2019

नई शिक्षा नीति: निजी स्कूलों के नाम से हटेगा पब्लिक शब्द


  • पब्लिक शब्द का इस्तेमाल सिर्फ सरकारी या सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूल ही कर सकेंगे
  • कमेटी ने निजी स्कूलों की मनमानी फीस वसूली पर भी रोक लगाने का सरकार को सुझाव दिया है



Monday, June 3, 2019

दक्षिण भारत में विवाद के बाद सरकार ने बदला नई शिक्षा नीति का 'ड्राफ्ट', अब हिंदी जरूरी नहीं



नई शिक्षा नीति में तीन भाषा का फॉर्मूला लागू करने के प्रस्ताव पर उठे विवाद के बाद सरकार ने इसे वापस ले लिया है। सरकार ने इस प्रस्ताव को वापस लेते हुए इस पर बदलाव किया है। नए ड्राफ्ट में हिंदी अनिवार्य होने वाली शर्त को हटा दिया गया है। तीन जून की सुबह केंद्र सरकार ने शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में बदलाव की घोषणा की है। पहले के प्रस्ताव में तीन भाषा का फॉर्मूला दिया गया था। जिसमें राज्य की मूल भाषा के साथ ही स्कूली पाठ्यक्रम में तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी को अनिवार्य करने का प्रस्ताव शामिल था। 

नई शिक्षा नीति के संशोधित ड्राफ्ट में अनिवार्य की जगह 'फ्लेक्सिबल' शब्द का उपयोग किया गया है। इसके अनुसार, अब मातृभाषा और स्कूली भाषा के अलावा तीसरी भाषा का चुनाव छात्र अपनी मर्जी से कर पाएंगे। इस तीसरी भाषा का चयन करने के लिए छात्र अपने शिक्षक और स्कूल की मदद ले सकता है। ऐसे में पूरी संभावना है कि जिस भाषा में स्कूल छात्र की आसानी से मदद कर पाएगावही उसकी तीसरी भाषा होगी। दक्षिण भारत में अधिकतर स्कूलों में तीसरी भाषा हिंदी नहीं होगी, इसकी भी पूरी संभावना है। 

मंत्री पोखरियाल ने कहा था- भाषा थोपी नहीं जाएगी

दक्षिण भारत में उठे विवादों के बाद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ने भी स्पष्ट किया था कि सरकार अपनी नीति के तहत सभी भारतीय भाषाओं के विकास को प्रतिबद्ध है और किसी प्रदेश पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। उन्होंने कहा था कि नई शिक्षा नीति का मसौदा केवल एक रिपोर्ट है। इस पर लोगों एवं विभिन्न पक्षकारों की राय ली जाएगी, उसके बाद ही कुछ होगा। 

विदेश मंत्री ने भी ट्विटर पर दी थी प्रतिक्रिया

गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी पढ़ाने का प्रस्ताव देने वाली शिक्षा नीति के मसौदे पर तमिलनाडु में आक्रोश को लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रविवार को कहा था कि इस मुद्दे पर अंतिम फैसला लिए जाने से पहले राज्य सरकारों से परामर्श लिया जाएगा। 

एक ट्विटर यूजर के सवाल पर प्रतिक्रिया देते हुए जयशंकर ने ट्वीट किया कि एचआरडी मंत्री को सौंपी गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति महज एक मसौदा रिपोर्ट है। आम जनता से प्रतिक्रिया ली जाएगी। राज्य सरकारों से परामर्श किया जाएगा। इसके बाद ही इस मसौदा रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाएगा।

हिंदी को लेकर हल्ला


विरोध के नाम पर विरोध की राजनीति: नई शिक्षा नीति के मसौदे को लेकर तमिलनाडु में हिंदी को लेकर हल्ला
नई शिक्षा नीति का मसौदा सामने आते ही तमिलनाडु में जिस तरह हिंदी का विरोध शुरू हो गया उससे यही साबित होता है कि हमारे देश में कुछ नेता किस तरह विरोध के नाम पर विरोध की राजनीति करने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। नि:संदेह नई शिक्षा नीति के मसौदे में त्रिभाषा फार्मूले की चर्चा की गई है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी लागू करने का फैसला ले लिया गया है। कम से कम नेताओं को तो यह अच्छी तरह पता होना चाहिए कि प्रस्ताव और फैसले में अंतर होता है। शिक्षा नीति के संदर्भ में तो यह न जाने कब से स्पष्ट है कि पहले उसका मसौदा आता है और फिर उस पर व्यापक चर्चा के बाद आम सहमति से उसे लागू किया जाता है।
समझना कठिन है कि तमिलनाडु के कुछ नेताओं ने यह निष्कर्ष कैसे निकाल लिया कि नई शिक्षा नीति में जो कुछ कहा गया है वह अंतिम फैसले के रूप में है? यह आश्चर्यजनक है कि इस तरह का निष्कर्ष निकालने वालों
में पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्र्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम भी शामिल हैं। स्पष्ट है कि तमिलनाडु के नेता लोगों की भावनाओं को भड़काकर अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करना चाह रहे हैं। उनके इस रवैये के चलते तमिलनाडु में कुछ अन्य संगठन भी हिंदी के विरोध में आगे आ जाएं तो हैरत नहीं। वैसे भी यह एक तथ्य है कि तमिलनाडु में रह-रहकर हिंदी के खिलाफ आवाज उठती रहती है। यह आवाज उठाने के लिए तरह-तरह के बहाने इसलिए खोज लिए जाते हैं, क्योंकि कुछ लोगों ने हिंदी विरोध को अपनी राजनीति का जरिया बना लिया है। यह बात और है कि यही लोग जब चुनाव आते हैं तो तमिलनाडु के हिंदी भाषी लोगों को लुभाने के लिए अपने पोस्टर-बैनर हिंदी में लगवाते हैं!
तमिलनाडु अथवा देश के अन्य राज्यों के लोग हिंदी के विरोध में कुछ भी क्यों न कहें, इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि राष्ट्रभाषा का दर्जा न हासिल करने के बावजूद हिंदी देश की सबसे प्रभावशाली संपर्क भाषा बन गई है। आज यदि देश में कोई भाषा संपर्क भाषा का स्थान लेने की योग्यता रखती है तो वह हिंदी ही है। वास्तव में इसी कारण देश के गैर हिंदी भाषी इलाकों में हिंदी का तेजी से विस्तार हुआ है। इस विस्तार का एक बड़ा कारण हिंदी की उपयोगिता है।
यदि हिंदी की उपयोगिता को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार की कोई पहल की जाती है तो आखिर इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? आपत्ति करने वालों को इस सच्चाई से परिचित होना चाहिए कि दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के लोगों के लिए हिंदी एक आवश्यकता बन गई है। आज जब नौकरी, व्यापार आदि के कारण हर प्रांत के लोगों की देश के दूसरे हिस्सों में आवाजाही और साथ ही बसाहट बढ़ती जा रही है तब फिर यह समय की मांग है कि संपर्क भाषा का पर्याय बन गई हिंदी को सहर्ष अपनाया जाए। कई राज्यों ने ऐसा ही किया है और इनमें अरुणाचल सबसे बढ़िया उदाहरण है। इस उदाहरण की अनदेखी करना सच से मुंह मोड़ना ही है।

Saturday, June 1, 2019

नई शिक्षा नीति


  • प्राइमरी की पढाई सिर्फ मातृ भाषा में होगी जब विषय तैयार तब एग्जाम
  • राष्ट्रिय शिक्षा आयोग का गठन
  • निजी स्कूलों की मनमानी पर लगा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार: साल में दो बार हो सकती हैं बोर्ड परीक्षाएं


मानव संसाधन मंत्रालय के विशेषज्ञों की कमेटी ने सेमेस्टर सिस्टम की तर्ज पर बोर्ड परीक्षाएं भी साल में दो बार आयोजित करने की सिफारिश की है। इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली कमेटी ने शुक्रवार शाम को नए मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को राष्ट्रीय शिक्षा नीति का ड्राफ्ट सौंप दिया।
 
ड्राफ्ट में कहा गया कि 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षा में बच्चों में तनाव कम करना चाहिए। छात्रों को बोर्ड परीक्षा में विषयों को दोहराने की अनुमति देने के लिए एक नीति बनाने को कहा गया है। इसके तहत छात्र को जिस सेमेस्टर में लगता है कि वह परीक्षा देने के लिए तैयार है, उस समय उसकी परीक्षा ली जानी चाहिए। बाद में अगर उसे लगता है कि वह और बेहतर कर सकता है तो उसे परीक्षा देने का एक और विकल्प देना चाहिए। साथ ही कंप्यूटर व तकनीक के जमाने में कंप्यूटर आधारित परीक्षा और पाठ्यक्रम कौशल विकास पर आधारित हो।
 
कमेटी ने अंग्रेजी के साथ भारतीय भाषाओं व संस्कृत या लिबरल आर्ट्स को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। इसके अलावा नर्सरी से पांचवीं कक्षा तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाई कराने और 1 से 18 वर्ष आयु तक के बच्चों को मुफ्त गुणवत्ता युक्त शिक्षा देने को कहा है। शिक्षा के अधिकार को पहली कक्षा की बजाय नर्सरी और आठवीं की बजाय 12वीं तक का विस्तार करने का सुझाव दिया गया है। मौजूदा स्कूल पाठ्यक्रम और पुस्तकों में गणित, खगोल विज्ञान, दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान, योग, वास्तुकला, चिकित्सा के साथ साथ राजनीति, शासन, समाज और भारतीय ज्ञान प्रणाली में योगदान देने वाले भारतीयों के विषयों को शामिल किया जाना चाहिए। 

कमेटी ने राष्ट्रीय शिक्षा आयोग गठित करने का भी सुझाव दिया। इसके जरिये देश में शिक्षा के दृष्टिकोण को विकसित, कार्यान्वित, मूल्यांकन और संशोधित किया जा सके। पैनल ने जोर दिया कि शिक्षा और सिखाने के तरीके पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय किया जाना चाहिए। 

निजी स्कूलों को हो फीस तय करने की स्वतंत्रता 

मसौदे के मुताबिक, निजी स्कूलों को अपना फीस ढांचा तय करने की स्वतंत्रता हो, लेकिन मनमाने तरीके से फीस बढ़ाने की मनाही होनी चाहिए। स्कूल डेवलपमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर फंड के नाम पर इसमें बढ़ोतरी जायज नहीं ठहराई जा सकती। उचित स्थिति में फीस बढ़ोतरी स्वीकार्य है। इसके लिए महंगाई दर और दूसरे अहम फैक्टर देखकर तय करना होगा कि कितने प्रतिशत तक फीस बढ़ाई जाए। हर तीन साल में राज्यों की स्कूल नियामक प्राधिकरण इसकी समीक्षा करेगा

तीन और चार साल की डिग्री की सिफारिश

पैनल ने स्नातक प्रोग्राम में तीन और चार वर्षीय डिग्री का सुझाव दिया है। चार वर्षीय डिग्री प्रोग्राम में पढ़ाई करने के बाद छात्र एक साल में सीधे मास्टर डिग्री कर सकता है। एमफिल प्रोग्राम को खत्म करने की सिफारिश की गई है। लिबरल एजुकेशन इंस्टीट्यूशन के तहत बैचलर ऑफ लिबरल आर्ट्स, बैचलर ऑफ लिबरल एजुकेशन डिग्री विद रिसर्च शुरू करने का सुझाव दिया है। 

1986
में बनी थी मौजूदा शिक्षा नीति

मौजूदा शिक्षा नीति 1986 में बनाई थी और 1992 में इसे संशोधन किया गया था। नई शिक्षा नीति भाजपा के चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा थी। मंत्रालय के विशेषज्ञ पैनल में कस्तूरीरंगन के अलावा गणितज्ञ मंजुल भार्गव के साथ ही आठ सदस्य हैं। विशेषज्ञों ने पूर्व कैबिनेट सचिव टी एस सुब्रमण्यन की अध्यक्षता वाले पैनल और मंत्रालय द्वारा गठित पैनल की रिपोर्ट को भी ध्यान में रखा, जब इसकी अध्यक्षता स्मृति ईरानी कर रही थीं।

अहम सुझाव  

- विश्व के शीर्ष 200 संस्थानों के कैंपस भारत में खोले जाएं। नालंदा, तक्षशिला की तर्ज पर भारतीय प्राचीन विश्वविद्यालयों को आगे बढ़ाया जाए। 
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मल्टीडिस्पलिनेरी यूनिवर्सिटी व कॉलेज खोले जाएं, जो एक साथ कई विषयों की पढ़ाई करवाते हों। साहित्य, भाषा, खेल, योग, आयुर्वेद, प्राचीन, मध्यकालीन इतिहास और संगीत पर फोकस किया जाना चाहिए।

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यूजीसी को भंग कर हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (एचईसीआई) एक्ट-2018 बनाया जाए।
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नेशनल टेस्टिंग एजेंसी से सभी प्रवेश और प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित की जाएं। कंप्यूटर आधारित परीक्षा पर जोर दिया जाए।
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नेशनल स्कॉलरशिप फंड ईजाद हो, ताकि छात्रों को शिक्षा में आगे बढ़ने का मौका मिले। इसके अलावा गरीब छात्रों को फीस माफी मिले।