शिक्षकों पर हमला
हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल में
विभिन्न स्कूलों व कालेजों में शिक्षकों पर हमले तेज हुए हैं। एक सभ्य समाज में
शिक्षकों पर हमले की जितनी निंदा की जाए वह कम है लेकिन इसके विरुद्ध मुंह खोलने
वाले एक शिक्षक पर ही कहर बरपा देने की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई है।
दक्षिण 24 परगना के काकद्वीप में शिक्षक गौतम
मंडल ने 26
जनवरी को स्कूल में
गणतंत्र दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लेते हुए राज्य में शिक्षकों पर बढ़ते
हमले पर चिंता जताई और इसकी निंदा की। सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस से जुड़े
लोगों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उनलोगों ने उक्त शिक्षक पर हमला बोल दिया।
शिक्षक गौतम मंडल की बेरहमी से पिटाई की गई और किसी से इसकी शिकायत करने पर उन्हें
जान से मारने की भी धमकी दी गई।
अस्पताल में जांच कराने के बाद
थाना पहुंचने पर पुलिस पहले शिक्षक की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए तैयार नहीं थी
लेकिन जब मामला तूल पकडऩे लगा और मीडिया में खबरें चलने लगी तब जाकर पुलिस ने
शिक्षक की रिपोर्ट दर्ज की। बाबू सोना नामक जिस व्यक्ति की मौजूदगी में शिक्षक पर
हमला हुआ वह स्कूल की संचालन कमेटी का प्रमुख है और सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस
से संबद्ध बताया गया है। थाना में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद अब शिक्षक को जान से
मारने की धमकियां मिलने लगी है। उस पर मामला वापस लेने का दबाव डाला जा रहा है।
शिक्षक का पूरा परिवार दहशत में है। हालांकि मानवाधिकार संगठन एपीडीआर शिक्षक के
बचाव में सामने आया है। राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने भी शिक्षक पर हमले की निंदा
की और कहा है कि शिक्षा को राजनीति से मुक्त किया जाना चाहिए।
राज्यपाल के कानों तक यह बात पहुंचने और मानवाधिकार तथा विभिन्न शिक्षक संगठनों के मुखर होने के बाद हो सकता है कि उक्त शिक्षक को कुछ राहत मिले लेकिन सवाल उठता है कि क्या किसी व्यक्ति के जुल्म व अत्याचार के खिलाफ बोलने पर सत्तारूढ़ दल के समर्थक उसके साथ इसी तरह का सलूक करेंगे? समाज में शिक्षक एक सम्मानीय व्यक्ति होता है। सभी उसका इसलिए सम्मान करते हैं कि वह ज्ञान की ज्योति जलाता है।
किसी भी मुद्दे पर शिक्षक के
वक्तव्य व विचारों का सम्मान होना चाहिए। गौतम मंडल ने तो गणतंत्र दिवस पर
शिक्षकों पर बढ़ते हमले पर चिंता जाहिर की थी। आजादी के 67 वर्ष बाद यदि कुछ लोग गणतंत्र दिवस
का महत्व नहीं समझें और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का हनन करने लगें तो
उन्हें क्या समझा जाए। ऐसे लोग साधारण नहीं हैं बल्कि सत्तारूढ़ दल के आदमी हैं।
सत्तारूढ़ या विपक्ष कोई भी राजनीतिक दल क्यों न हो, इस तरह के लोगों को संगठन में जगह नहीं देनी चाहिए जिनके अंदर जनता
के मौलिक अधिकारों के प्रति सम्मान न हो।
स्थानीय संपादकीयः पश्चिम बंगाल
साभार दैनिकजागरण
